मध्यमहेश्वर मंदिर में होती है भगवान शिव कि नाभी कि पूजा.

मध्यमहेश्वर मंदिर में होती है भगवान शिव कि नाभी कि पूजा.

आखिर क्यों मध्यमहेश्वर को पंचकेदार धाम का तीसरा धाम कहा जाता है.

मध्यमहेश्वर मंदिर भगवान शिव को समर्पित है. इस मंदिर की ख़ास बात यह है कि यहाँ भगवान शिव कि नाभि कि पूजा की जाती है. यह मंदिर पंचकेदार में से तीसरे स्थान पर आता है. उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग नामक जगह में यह मंदिर स्थित है और यह समुंद्र जिले से 3289 किलोमीटर की उचाई पर स्थित है. इस मंदिर की स्थापना पांडवों द्वारा करवाई गई थी. हालाँकि अभी तक इस बात का रहस्य बना हुआ है की इसकी स्थापना कब और किस सन में हुई थी.

यह मदिर रुद्र्प्रय्ग के मनसूना नामक स्थान पर स्थित है. जिस जगह यह मंदिर बना हुआ है उस स्थान से कुछ ही दुरी पर एक बुग्याल आता है जहां पर एक छोटा सा मंदिर और है. जिसको बुढा मध्यमहेश्वर मंदिर कहा जाता है. ऐसा कहा जाता है की पंचकेदार के जितने भी मंदिर होते हैं उन मंदिरों में भगवान शिव के शरीर के पांच अंगों की पूजा की जाती है. यही वजह है की पंचकेदार के इस तीसरे स्थान के मंदिर में भगवान शिव की नाभि कि पूजा करी जाती है.

एक कथा के अनुसार: इस मंदिर को पंचकेदार इसलिए माना जाता है क्यूंकि महाभारत के युद्ध के बाद पांडव अपने पापो से मुक्ति चाहते थे इसलिए भगवान श्रीकृष्ण ने पांडवो को सलाह दी थी कि वे भगवान शंकर का आर्शीवाद प्राप्त करे. इसलिए पांडवो ने भगवान शंकर का आर्शीवाद प्राप्त करने के लिए वाराणसी पहुँच जाते है परन्तु भगवान शंकर वाराणसी से चले गए होते है. और गुप्तकाशी में आकर छुप जाते है. क्योकि भगवान शंकर पांडवो से नाराज थे अर्थात पांडवो ने अपने कुल का नाश किया था. जब पांडव गुप्तकाशी पंहुचे तो फिर भगवान शंकर केदारनाथ पहुँच गए , जहां भगवान शंकर ने बैल का रूप धारण कर रखा था. पांडवो ने भगवान शंकर को खोज कर उनसे आर्शीवाद प्राप्त किया था. ऐसा माना जाता है कि जब भगवान शंकर बैल के रूप में अंतर्ध्यान हुए, तो उनके धड़ से ऊपर का भाग काठमाण्डू में प्रकट हुआ. अब वहां पशुपतिनाथ का प्रसिद्ध मंदिर है. शिव की भुजाएं तुंगनाथ में, मुख रुद्रनाथ में, नाभि मध्यमाहेश्वर में, भगवान शंकर बैल की पीठ की आकृति-पिंड के रूप में श्री केदारनाथ में पूजे जाते हैं और जटा कल्पेश्वर में प्रकट हुए इसलिए इन पांच स्थानों में श्री मध्यमहेश्वर को पंचकेदार कहा जाता है.

मदमहेश्वर जाने के लिए सबसे पहले दिल्ली से हरिद्वार ऋषिकेश होते हुए रुद्रप्रयाग जाना पडेगा. रुद्रप्रयाग से केदारनाथ जाने वाली सडक पर गुप्तकाशी से कुछ पहले कुण्ड नामक जगह आती है जहां से ऊखीमठ के लिए सडक अलग होती है. ऊखीमठ पहुंचकर उनियाना के लिए टैक्सियां, जीपें और बसें मिल जाएंगी। उनियाना से पैदल यात्रा शुरू होती है जो 23 किलोमीटर लंबी है और रांसी, गौण्डार होते हुए मदमहेश्वर पहुंचती है. यहां केवल सीजन में ही जाया जा सकता है. जब तक भी कपाट खुलते हैं, कभी भी जा सकते हैं. आमतौर पर मदमहेश्वर के कपाट केदारनाथ के लगभग साथ ही खुलते हैं और केदारनाथ के कपाट बन्द होने के बाद बन्द होते हैं। सीधी सी बात है कि अगर आप केदारनाथ जा रहे हैं तो मदमहेश्वर भी जा सकते हैं. अगर चार धाम यात्रा सीजन के अलावा आप वहां जाना चाहते हैं तो रुद्रप्रयाग जिला मुख्यालय से अनुमति लेनी पडेगी.