धरती का कार्य पूर्ण होने के बाद सबसे पहला यग हुआ था प्रयाग में (इलाहाबाद).

धरती का कार्य पूर्ण होने के बाद सबसे पहला यग हुआ था प्रयाग में (इलाहाबाद).

संगम नगरी प्रयाग जहाँ गंगा, यमुना और सरस्वती का होता है संगम. जिसका वैदिक नाम है "प्रयाग" 

इलाहबाद यानि संगम नगरी प्रयागराज धरती का वह स्थान है जहां पर भगवान ब्रह्मा ने धरती का निर्माण कार्य पूर्ण करने के बाद सबसे पहला यग करवाया था. इसलिए वेदों में इसका सर्व प्रथम नाम प्रयाग रखा गया था. प्रथम से "प्र" को लिया गया और यग से "याग" को लिया गया. जिसके बाद प्रयाग की उत्पति हुई. यहाँ तीन नदियों का संगम होता है. यमुना, गंगा और सरस्वती. इसलिए इस स्थान को संगम नगरी भी कहा जाता है.

प्रयागराज, उत्तर प्रदेश के बड़े जनपदों में से एक है. यह गंगा, यमुना तथा गुप्त सरस्वती नदियों के संगम पर स्थित है. संगम स्थल को त्रिवेणी कहा जाता है एवं यह हिन्दुओं के लिए विशेषकर पवित्र स्थल है. प्रयाग (वर्तमान में प्रयागराज) में आर्यों की प्रारंभिक बस्तियां स्थापित हुई थी. इस पावन नगरी के अधिष्ठाता भगवान श्री विष्णु स्वयं हैं और वे यहाँ माधव रूप में विराजमान हैं. भगवान के यहाँ बारह स्वरूप विध्यमान हैं. जिन्हें द्वादश माधव कहा जाता है. सबसे बड़े हिन्दू सम्मेलन महाकुंभ की चार स्थलियों में से एक है, शेष तीन हरिद्वार, उज्जैन एवं नासिक हैं। हिन्दू धर्मग्रन्थों में वर्णित प्रयाग स्थल पवित्रतम नदी गंगा और यमुना के संगम पर स्थित है. यहीं सरस्वती नदी गुप्त रूप से संगम में मिलती है, अतः ये त्रिवेणी संगम कहलाता है, जहां प्रत्येक बारह वर्ष में कुंभ मेला लगता है.

प्रयाग सोम, वरूण तथा प्रजापति की जन्मस्थली है.प्रयाग का वर्णन वैदिक तथा बौद्ध शास्त्रों के पौराणिक पात्रों के सन्दर्भ में भी रहा है. यह महान ऋषि भारद्वाज, ऋषि दुर्वासा तथा ऋषि पन्ना की ज्ञानस्थली थी. ऋषि भारद्वाज यहां लगभग 5000 ई०पू० में निवास करते हुए 10000 से अधिक शिष्यों को पढ़ाया। वह प्राचीन विश्व के महान दार्शनिक थें.

वर्तमान झूंसी क्षेत्र, जो कि संगम के बहुत करीब है, चंद्रवंशी (चंद्र के वंशज) राजा पुरुरव का राज्य था। पास का कौशाम्बी क्षेत्र वत्स और मौर्य शासन के दौरान समृद्धि से उभर रहा था. 643 ई०पू० में चीनी यात्री हुआन त्सांग ने पाया कि कई हिंदुओं द्वारा प्रयाग का निवास किया जाता था जो इस जगह को अति पवित्र मानते थे.

1575 ई० — संगम के सामरिक महत्व से प्रभावित होकर सम्राट अकबर ने “इलाहाबास” (वर्तमान में प्रयागराज) के नाम से शहर की स्थापना की जिसका अर्थ “अल्लाह का शहर” है मध्ययुगीन भारत में शहर का सम्मान भारत के धार्मिक-सांस्कृतिक केंद्र के तौर पर था। एक लंबे समय के लिए यह मुगलों की प्रांतीय राजधानी थी जिसे बाद में मराठाओं द्वारा कब्जा कर लिया गया था.

1801 ई० — शहर का ब्रिटिश इतिहास इस वर्ष शुरू हुआ जब अवध के नवाब ने इसे ब्रिटिश शासन को सौंप दिया। ब्रिटिश सेना ने अपने सैन्य उद्देश्यों के लिए किले का इस्तेमाल किया.

1857 ई० — यह शहर आजादी के युद्ध का केंद्र था और बाद में अंग्रेजों के खिलाफ भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की गढ़ बन गया।

1858 ई० — आजादी के प्रथम संग्राम 1857 के पश्चात ईस्ट इंडिया कंपनी ने मिंटो पार्क में आधिकारिक तौर पर भारत को ब्रिटिश सरकार को सौंप दिया था। इसके बाद शहर का नाम इलाहाबाद रखा गया तथा इसे आगरा-अवध संयुक्त प्रांत की राजधानी बना दिया गया.

1868 ई० — प्रयागराज न्याय का गढ़ बना जब इलाहाबाद उच्च न्यायालय की स्थापना हुई.

1871 ई० — ब्रिटिश वास्तुकार सर विलियम ईमरसन ने कोलकाता में विक्टोरिया मेमोरियल डिजाइन करने से तीस साल पहले आल सैंट कैथेड्रल के रूप में एक भव्य स्मारक की स्थापना की.

1887 ई० — इलाहाबाद विश्वविद्यालय चौथा सबसे पुराना विश्वविद्यालय था। प्रयागराज भारतीय स्थापत्य परंपराओं के साथ संश्लेषण में बने कई विक्टोरियन और जॉर्जियाई भवनों में समृद्ध रहा है. प्राम्भ से ही प्रयागराज विद्या, ज्ञान और लेखन का गढ़ रहा है. यह भारत का सबसे जीवंत राजनीतिक तथा आध्यात्मिक रूप से जागरूक शहर है.

यदि आप प्रयागराज घूमना चाहते है तो आप भारत के किसी भी बस या रेल स्टेशन से यहाँ आने के लिए रेल या बस ले सकते हैं. जो की आपको आसानी से मिल जाएगी.