इस जगह पर करती हैं मां श्याम सुन्दरी जाग्रत अवस्था में विराजमान.

इस जगह पर करती हैं मां श्याम सुन्दरी जाग्रत अवस्था में विराजमान.

तो इस जगह पर करती हैं माँ श्याम सुंदरी अपने जागृत अवस्था में निवास.

उत्तराखंड में सभ्यता और मान्यता आपको जगह-जगह देखने को मिलेगी और नवरात्रों के पावन अवसर पर तो मां भगवती कि अलोकिक गाथा आपको हर जगह सुनने को मिल जाएगी. इसी लिए तो पहाड़ों को देवभूमी कहा जाता है. तो चलिए आपको बताते है उत्तराखंड के एक ऐसे गाँव के बारे में जिसका नाम है "रिखेड़ा" (बनचुरी) जो कि पौड़ी जिले के अंतर्गत आता है. और इस गांव का बड़ा ही पौराणिक मंदिर है "माँ श्याम सुंदरी" का और जिस जगह पर यह मन्दिर है उस जगह को देवी डांडा कहा जाता है. और यहाँ माँ भगवती के काली स्वरुप कि पूजा की जाती है और इस मदिर को "माँ श्याम्सुन्दरी" के नाम से ही जाना जाता है|

मंदिर कि स्थापना कई वर्ष पहले रिखेड़ा गाँव के एक पुजारी परिवार ने कि थी और उसी परिवार के वंशज आज तक इस मंदिर की पूजा करते है. मंदिर के पुजारी देवेन्द्र लखेड़ा जी की माने तो वह हर साल नवरात्री के माह में अष्ठमी के दिन यहाँ आते है और मंदिर की पौराणिक पूजा में शामिल होते है. और किसी कारण वह नहीं शामिल हो पाते तो उनका बड़ा बेटा प्रयांशु लखेड़ा इस पूजा में शामिल होता है. उनका कहना है कि उनके परिवार वालों में से किसी भी एक सदस्य को यहाँ आना ही पड़ता है वरना पूजा अधूरी मानी जाती है.

मंदिर की स्थापना के दौरान पुजारी परिवार कि माने तो उनका कहना है कि माँ श्याम सुन्दरी की मूर्ति यहाँ पर पहले से ही मौजूद थी. जिसके पश्चात माता ने गाँव के पुजारी को सपने में दर्शन दिये थे. और मंदिर निर्माण का मार्गदर्शन करवाया था. और तभी से यह मन्दिर स्थापित है. आस्था और परम्पराओं कि माने तो दुर्गा अष्ठमी के दिन मन्दिर में भव्य भंडारे का आयोजन करा जाता है और दूर-दूर से यहाँ लोग माता के दर्शन के लिए उपस्थित होते हैं.

पुजारी परिवार देवी-डांड में सातवे दिन की सुबह देवी श्यामसुन्दरी के मंदिर पहुंचते है. माता के डोले और निशान के साथ। यह एक छोटी सी यात्रा होती है जो कि ग्राम रिखेड़ा “थरप” से “बनचुरी” कि और आती है. और इस यात्रा में गाँव के सभी लोग शामिल होते है. और तब नवरात्रे के आठवे दिन माँ श्याम सुंदरी की पूजा की जाती है. और उसके बाद मेला लगता है और इस मेले में दूर-दूर से लोग भाग लेते है. ऐसा कहा जाता है की पूजा में मांगी गई मुराद ज़रूर पूरी होती है.

ऐसा भी कहा जाता है कि माता कि आरती के दौरान मंदिर परिसर में लगी हुई मंदिर की घंटियाँ अपने आप हिलने लगती है. और जब तक आरती चलती है तब तक मन्दिर की घंटियाँ स्वतः ही हिलती रहती है और इसी वजह से मंदिर को सिध्पिठ भी कहा जाता है. और मंदिर के पुजारी कि माने तो माँ श्याम्सुन्दरी इस स्थान में जागृत अवस्था में रहती है.

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